नई कविता – जर्जरता
जर्जरता जर्जर था स्कूल, जर्जर दीवारें, टपकती छतें थीं मौत की पुकारें। कुर्सी थीं टूटी, खिड़की बेहाल, फिर भी चलता रहा शिक्षा का जाल। मासूम सपनों ने जब आँखें खोलीं, तो दीवारों की दरारों से उम्मीदें बोलीं। क ख ग पढ़ते-पढ़ते ढह गया संसार, गरीब माँ-बाप के सपनों पर हुआ प्रहार। जिनके आँगन में उजाला […]