जर्जरता

जर्जर था स्कूल, जर्जर दीवारें,
टपकती छतें थीं मौत की पुकारें।
कुर्सी थीं टूटी, खिड़की बेहाल,
फिर भी चलता रहा शिक्षा का जाल।

मासूम सपनों ने जब आँखें खोलीं,
तो दीवारों की दरारों से उम्मीदें बोलीं।
क ख ग पढ़ते-पढ़ते ढह गया संसार,
गरीब माँ-बाप के सपनों पर हुआ प्रहार।

जिनके आँगन में उजाला होना था,
उनका नाम अब शोक सभा में रोना था।
जिसने थामा था पेंसिल का सिरा,
अब ओढ़े हैं वही मौत का बसेरा।

ये हादसा नहीं, ये हत्या है,
बेवजह बुझे जीवनों की व्यथा है।
जर्जर राजनीति, जर्जर दंभ,
कागज़ों पर विकास, ज़मीं पर जंग।

नेता गरजेंगे, विपक्ष बरसेगा,
बयानबाज़ी में सारा सच छिपेगा।
कहेंगे “जाँच बैठा दी”, “सख़्त कदम होंगे”,
पर असली दोषी फिर बच निकलेंगे।

निलंबन होगा किसी मासूम शिक्षक का,
जो खुद टूटे बोर्ड और गिरी छत का गवाह था।
ऊपर बैठा अफ़सर बचा ले जाएगा गद्दी,
नीचे वाला ही भुगतेगा हर बार सज़ा सच्ची।

माँ की गोद अब क्यों सूनी है?
क्यों हर झोला अब झूलता नहीं है?
भेजा था सपना संवारने को स्कूल,
लौटी हैं लाश, हुई ये कैसी भूल ?

मुआवज़ा बाँट कर सिसकी दबा देगा शासन,
फिर गिरेगा – उसी ढर्रे से – अगला भवन।
एक और हादसा, होगा एक और बहाना,
बदल जाएगा बस साल और इलाका।

यह कविता नहीं, सवाल है ?
कब सुधरेगा सिस्टम यह बवाल है ?
हर मौत पे चलती है सियासत की चाल,
जवाबदेही खो गई है रसूखों के जाल।

✍-
धर्मेन्द्र कुमार धर्मी
दौसा,राजस्थान

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